अधिक मास में किया गया जप- तप मानव जीवन में बड़ा ही प्रभावशाली होता है- मंगलेश्वर दास जी बैरागी 

झकनावदा (योगेश पंवार)- मलमास, अधिक मास अर्थात पुरुषोत्तम मास 18 सितंबर 2020 से 16 अक्टूबर 2020 का महत्व इसका वैज्ञानिक पौराणिक आधार क्या है हम आपको बताते हैं कि इस बार श्राद्ध और नवरात्रि में 1 मार्च का अंतर क्यों हुआ। हिंदू कैलेंडर में हर 3 साल में एक बार एक अतिरिक्त माह होता है जिससे अधिक मास ,मलमास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की हिंदू धर्म परायण जनता इस पूरे मास में पूजा पाठ भागवत भक्ति व्रत उपवास जब और योग आदि धार्मिक कार्यक्रमों में सलग्न में रहती है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ ही भगवान को प्रसन्न कर अपना ईह लोक तथा परलोक सुधारने में जुड़ जाते हैं। अधिक मास के लिए श्री कृष्णा मंदिर के पुजारी मंगलेश्वर दास जी बैरागी ने बताया कि पुराणों में बड़ी ही सुंदर कथा सुनने को मिलती है यह कथा दैत्य राज हीरणकश्यप के वक्त से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार देश के राज्य हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान मांगा। क्योंकि अमरता का वरदान देना निषिद्ध है। इसलिए ब्रह्मा जी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर नारी पशु देवता या असुर मारना सके वह वर्ष के 12 महीने में मृत्यु को प्राप्त ना हो जब वह मरे तो ना दिन का समय हो ना रात का वह ना किसी अस्त्र से मरे ना किसी शास्त्र से उसे ना घर में मारा जा सके ना ही घर के बाहर मारा जा सके। ईश्वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानी आधा पुरुष और आधे शहर के रूप में प्रकट होकर शाम के समय देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीरकर उसे मृत्यु के द्वार भेज दिया। वह उसी क्रम में हमारे द्वारा श्री कृष्ण मंदिर पर अधिक मास में प्रतिदिन कथा का वाचन किया गया जिसमें नगर के भक्तजनों ने सुबह शाम मंदिर परिसर में पहुंचकर कथा का श्रवण किया। व 16 अक्टूबर को अधिक मास का समापन हमने इस प्रकार किया कि राधा कृष्ण उपासना पूजा एवं सामूहिक यज्ञ का आयोजन का समापन किया जिस में महाआरती उतारी गई तत्पश्चात प्रसादी का वितरण पर भगवान के जय घोष लगाए गए।

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